तलाक के लिए अलगाव की शर्त मौलिक अधिकारों का उल्लंघन, केरल हाई कोर्ट का बड़ा बयान

नई दिल्ली: ने तलाक एक्ट के तहत आपसी सहमति से तलाक की अर्जी दाखिल करने के लिए एक साल या इससे अधिक के को असंवैधानिक करार दिया है। अदालत ने कहा है कि यह शर्त मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।

'एकसमान विवाह संहिता लागू करने पर हो विचार'

जस्टिस ए. मुहम्मद मुस्ताक और जस्टिस शोभा अन्नम्मा ऐपन की बेंच ने केंद्र सरकार से शादी से संबंधित विवादों में पति-पत्नी की भलाई सुनिश्चित करने के लिए भारत में एकसमान विवाह संहिता लागू करने पर गंभीरता से विचार करने को कहा। बेंच ने कहा कि कानून वैवाहिक संबंधों में भलाई के संबंध में धर्म के आधार पर पक्षों को अलग करता है। एक धर्मनिरपेक्ष देश में कानूनी पितृसत्तात्मक दृष्टिकोण धर्म के बजाय नागरिकों की समान भलाई सुनिश्चित करने पर केंद्रित होना चाहिए। बेंच ने कहा, ‘राज्य का ध्यान अपने नागरिकों के कल्याण और भलाई को बढ़ावा देने पर होना चाहिए। भलाई के समान उपायों की पहचान करने में धर्म के लिए कोई जगह नहीं है?’

'अलगाव मौलिक अधिकारों का उल्लंघन'

केरल हाई कोर्ट ने यह आदेश एक युवा ईसाई दंपती की ओर से दायर याचिका पर दिया, जिसमें तलाक एक्ट-1869 की धारा-10ए के तहत तय की गई अलगाव की न्यूनतम अवधि (एक साल) को मौलिक अधिकारों का उल्लंघन बताते हुए उसे चुनौती दी गई थी। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि धारा-10ए के तहत एक साल के अलगाव की न्यूनतम अवधि का निर्धारण मूलभूत सिद्धांतों का उल्लंघन है और इसे असंवैधानिक घोषित किया जाता है। हाई कोर्ट ने परिवार अदालत को निर्देश दिया कि वह कपल की तलाक याचिका को दो सप्ताह के भीतर निपटाए और संबंधित पक्षों की और उपस्थिति पर जोर दिए बिना उनके तलाक को मंजूर करे।

'विवाहिता सहमति से संबंध बनाए तो रेप का केस नहीं'

इसके अलावा झारखंड हाई कोर्ट ने एक फैसले में कहा है कि अगर कोई शादी-शुदा महिला अपने पति के अलावा किसी दूसरे पुरुष के साथ सहमति के आधार पर शारीरिक संबंध बनाती है, तो बाद में वह उस पर रेप का केस नहीं कर सकती। कोर्ट ने कहा कि महिला किसी व्यक्ति के शादी के वादे पर भरोसा कर उसके साथ संबंध बनाने के बाद इसे शारीरिक शोषण का मामला कैसे बता सकती है? जस्टिस एसके द्विवेदी की कोर्ट ने मनीष नाम के एक शख्स की याचिका पर सुनवाई करते यह आदेश पारित किया।


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